बस्तर: कोविड संक्रमण के उपरांत वर्षाझा एवं उनके पति ने लगातार 65 दिनों तक जरूरतमंदों को मदद पहुंचाते रहे 

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 रिपोर्ट -अमलेंदु चक्रवर्ती

 बस्तर कार्यक्षेत्र से अलविदा कहने के बावजूद इस संकट की घड़ी में उन्होंने सैकड़ों जरूरतमंदों को मदद पहुंचाकर क्षेत्र व स्थानीय ग्रामीणों के प्रति अपने लगाव और मानवता का एक बेहतर उदाहरण दिया है

आधिकारिक तौर से क्षेत्र में कार्य करते हुए प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है, लेकिन संगठन और उसके कार्यक्षेत्र को छोड़कर भी यदि कोइ उस क्षेत्र के लोगों के लिए सोचता हैं और नीजीतौर पर मदद करने का प्रयास करता हैं, तो यह कर्तव्य नहीं बल्कि उस क्षेत्र के लोगों के प्रति स्नेह की पवित्र भावना है।

AMNS इंडिया की कॉर्पोरेट मामलों की पूर्व प्रमुख और टाटा स्टील की मीडिया ऐडवाइज़र रहीं वर्षा झा द्वारा बस्तर और उसके स्थानीय लोगों के प्रति ऐसा ही समान स्नेह देखा गया। पिछले दिनों कंपनी से इस्तीफा देने के बाद भी इस महामारी के दौर में बस्तर के कुछ अत्यधिक जरूरतमंद लोगों ने जब भी उनसे मदद के लिए संपर्क किया है, उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हर संभव मदद करने की कोशिश की.

उन्हें करीब से जानने वाले लोगों के मुताबिक पिछले दिनों वे खुद और उनके पति दोनों ही कोरोना संक्रमित हो गए और इस दौरान दोनों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कोरोना संक्रमण और उसके बाद के दिनों में उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, उन्हें देखते हुए दोनों ने फैसला किया कि वे अगले 65 दिनों तक कोविड के बाद के आघात से निपटने में जरूरतमंद लोगों की हर संभव मदद करेंगे.
प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्षा झा रात में अपने पति को अस्पताल में भर्ती कराकर जब घर लौट रही थी तो उन्हें तेलीबांधा सिग्नल के पास असहाय बदहवास हालत में एक व्यक्ति दिखाई पड़ा। पूछताछ करने से पता चला कि वह वह बस्तर के कामानार के अंदरूनी क्षेत्र से रायपुर के एक स्थानीय होटल में काम करने आया था। खाने और रहने की व्यवस्था होटल में ही हो जाती थी लेकिन कोरोना के चलते होटल बंद हो गया तो उसे रहने और खाना मिलना बंद हो गया. वह किसी तरह बस स्टॉप पर, रिक्शा में, दुकान के नीचे या मंदिरों की सीढ़ियों पर सोकर रात गुजारता था। उसे उम्मीद थी कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा और वह काम पर वापस आ जाएगा, इसलिए वह घर भी नहीं गया। इस बीच उसे तेज बुखार हुआ तो एक रिक्शावाला ने अंबेडकर अस्पताल रायपुर मे भर्ती करवाया। वहां सफलतापूर्वक उसका कोविड का इलाज किया गया। ठीक होने के बाद उसे वहां से छुट्टी दे दी गई लेकिन बहुत ज्यादा कमजोरी और पैसे की कमी के कारण वह घर नहीं जा पा रहा था। डिस्चार्ज होने के दो दिन बाद से वह ऐसे ही असमंजस और डर मे घूम रहा है। किसी ने उसे बताया कि तेलीबांधा में उसको किसी संस्था से मदद मिल सकती है इसलिए वह यहाँ भटक रहा है लेकिन कोई भी मददगार नहीं मिला। वर्षा झा ने पास खड़े पुलिसकर्मियों से संगठन के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की तो पता चला कि कोई संस्था है जो खाने का इंतजाम करती है लेकिन वह 11 बजे आ जाते हैं. यह जानने के बाद कि रात में कुछ भी व्यवस्था नहीं किया जा सकता, श्रीमती झा ने  आधी रात में ही किसी तरह से न केवल उस व्यक्ति के खाने और रहने की व्यवस्था करवाईं, बल्कि सुबह होने के बाद बस्तर लौटने की व्यवस्था भी करवा दीं। अगले दिन अस्पताल जाने से पहले, श्रीमती झा ने सुनिश्चित किया कि वह व्यक्ति सुरक्षित अपने गांव जा सके।
इस घटना के बाद भी वह अस्पताल आते जाते जरूरतमंद प्रवासी मजदूरों को देख उनके भोजन, दवा या घर वापस जाने की व्यवस्था करती रहीं.
 इस घटना के बाद ही दोनों पति पत्नी ने फैसला किया कि वर्ष 2021 के अपने 365 दिनों में से 65 दिन दोनों ही पोस्ट कोविडभय से प्रभावित जरूरतमंदों की मदद करेंगे।
 इस तरह किसी जरूरतमंद की मदद करने के बाद एक के क्रम मे दोनों को 365 से भी ज्यादा लोगों ने मदद के लिए संपर्क किया और दोनों ने सभी की हर संभव मदद भी की. इस तरह दोनों ने कोविड से ठीक होने के बाद इन 65 दिनों में किए गए अपने सारे काम ईश्वर और मानवता के नाम पर समर्पित किए हैं. छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों (बस्तर संभाग से अधिकतम), बिहार, झारखंड, उड़ीसा, एपी/तेलंगाना, महाराष्ट्र के प्रवासी लोगों और दिल्ली से भी कुछ सरकारी अधिकारियों, पत्रकारों ने पोस्टकोविड के लिए और कोविड के दौरान भी मदद के लिए उनसे संपर्क किया।
ज्यादातर लोग पोस्टकोविड ट्रॉमा में थे जिनका मनोवैज्ञानिक परामर्श से ही समस्या का समाधान हो गया। कुछ को डॉक्टर की काउंसलिंग की जरूरत थी, इसलिए उन्हें डॉक्टर से संपर्क स्थापित करवाया गया। इसके साथ ही उन्होंने अपने खर्चे पर हजारों मास्क, सैकड़ों हैंड सैनिटाइजर, रेस्परोमीटर और ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, दवाएं और खाद्य सामग्री जरूरतमंदों को वितरित की। इसके अलावा घरेलू सहायिकाओं, सड़क किनारे फल-सब्जी विक्रेताओं में टीकाकरण के प्रति जागरुकता फैलाकर उन्हें इंजेक्शन लगवाने की व्यवस्था कराने में भी अपना योगदान दिया है।

जो लोग उन्हें करीब से जानते हैं, उनके मुताबिक उन्होंने बस्तर में टाटा स्टील, एस्सार और एएमएनएसआई कंपनी तथा इलाके के लोगों के प्रति अपनी भूमिका भी बखूबी निभाई है, जिसका सबूत बस्तर के लोगों के बीच आज भी आसानी से मिल जाएगा.