5G को लेकर भारत कितना तैयार है?

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2019 में भाजपा दूसरी बार सरकार बनाती है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रालयों का गठन होता है। देश के दूरसंचार मंत्रालय का नेतृत्व रविशंकर प्रसाद द्वारा किया जा रहा है। उनके द्वारा यह कहा गया था कि उनकी सरकार बनते ही 100 दिनों के अंदर 5G नेटवर्किंग के ट्रेल्स शुरू कर दिए जाएंगे और यह पहल दूरसंचार सेवाओं में एक क्रांति लाएगा।

लेखक: राजा रंजन 

2019 में भाजपा दूसरी बार सरकार बनाती है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रालयों का गठन होता है। देश के दूरसंचार मंत्रालय का नेतृत्व रविशंकर प्रसाद द्वारा किया जा रहा है। उनके द्वारा यह कहा गया था कि उनकी सरकार बनते ही 100 दिनों के अंदर 5G नेटवर्किंग के ट्रेल्स शुरू कर दिए जाएंगे और यह पहल दूरसंचार सेवाओं में एक क्रांति लाएगा।

लेकिन क्या ऐसा हो पाया है? जवाब है नहीं। कोरोना महामारी की वजह से इस कार्य की गति और धीमी हो गई है। इसी बीच देश में एक और बहस छिड़ी हुई थी कि क्या भारत को 5G के इक्विपमेंट्स चीन की कंपनियों से लेने चाहिए या नहीं और अंततः हमने यह देखा कि सीमा विवाद की वजह से देश में एंटी चाइना सेंटीमेंट थी, जिसकी वजह से चीन की कंपनियों का 5G क्विपमेंट प्रदान करना देश के लोगों को यह व्यापार देश हित में नहीं लगा, साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार की अन्य घरेलू व्यवस्थाओं में देरी की वजह से 5G नेटवर्किंग ट्रेल्स में विलंब देखने को मिला।

यह सब कारण सरकारों द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि जब उनके कहे हुए वादे जमीनी स्तर पर खोखले दिखाई दें तो वे इन बहानो का इस्तेमाल कर अपनी कही हुई बातों पर पर्दा डाल सके। श्री रविशंकर प्रसाद के दावे 5G नेटवर्किंग को लेकर जमीनी स्तर पर शून्य हैं। केंद्र सरकार ने 5G ट्रायल्स को लेकर इसी महीने अनुमति दे दी है, लेकिन अभी तक कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटित नहीं किए गए हैं, जिसके जरिए कंपनियां 5G ट्राइल्ज कर सकें। धीरे-धीरे भारत में 5G ट्रायल्स रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ यह चिंताएं भी जताई जा रही है कि जो जमीनी स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है, क्या भारत में वे आवश्यकताएं सम्पूर्ण रूप में उपस्थित हैं?

यह सब तो सरकार से जुड़े तथ्य थे, पर यहां पर एक सवाल जरूर उठता है कि क्या भारत के लोग यानी भारत के उपभोक्ता 5G के लिए तैयार है?

इस सवाल का जवाब हमें एरिकसन कंजूमर लैब की एक स्टडी का अध्ययन करने से मिलता है। इस स्टडी के अनुसार भारत में फिलहाल 5G सेवाओ का कोई कमर्शियल यूजर तो नहीं है, लेकिन इस सेवा के बाजार में आते ही चार करोड़ स्मार्टफोन ग्राहक इस सेवा की तरफ स्विच कर जाएंगे। 2019 के मुकाबले भारत के स्मार्टफोन ग्राहकों में 5G सेवाओं को लेकर ज्यादा उत्साह है और इस स्टडी के आंकड़े भी यही दर्शाते हैं कि 67% ग्राहक इस सेवा का लाभ उठाने के लिए उत्सुक हैं। एरिकसन की रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत के स्माटफोन ग्राहक 5G प्लान के लिए 50% ज्यादा भुगतान करने को तैयार हैं।

5G ट्रायल्स जमीनी स्तर पर कब होंगे इसको लेकर अभी के लिए कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। 8 फरवरी के संसदीय स्थाई समिति की रिपोर्ट के अनुसार डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन के सेक्रेटरी अंशु प्रकाश ने अपने पैनल से यह कहा था कि 5G का phase roll out इस साल के अंत तक होगा या अगले साल की शुरूआत तक होगा। हालांकि जनवरी के महीने में भारती एयरटेल लिमिटेड ने 5G के कमर्शियल नेटवर्क पर प्रदर्शन किया था हालांकि वह प्रदर्शन small bandwidth पर किया गया था और उनके द्वारा यह भी कहा गया था कि वह 5G के कमर्शियल लॉन्च के लिए तैयार हैं। Vodafone-idea ने भी यह कहा था कि वह भी 5G सेवाओं के लिए तैयार है। वहीं दूसरी तरफ मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो ने यह दावा किया है कि रिलायंस जियो भारत में ही 5G के इक्विपमेंट बनाएगा जिससे भारत की निर्भरता 5G को लेकर विदेशी कंपनियों पर नहीं रहेगी। हालांकि इससे रिलायंस जियो की मोनोपोली भी भारत के मार्केट में स्थापित हो सकती है।

पर वह कौन सी ऐसी चुनौतियां है जिसका भारत  को 5G की सेवाओं को जमीनी स्तर पर स्थापित करते वक़्त उठानी पड़ेंगी?

भारत को अगर 5G के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना है तो उसे कॉपर बेस्ड टेलीकॉम नेटवर्क से ऊपर उठकर ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क की तरफ देखना होगा। साथ ही थोड़ी थोड़ी दूरी पर टॉवर्स को स्थापित करना होगा ताकि 5G नेटवर्क की पहुंच तब तक समान रूप से पहुंच सके। भारत के सिर्फ 30% टावर ही फाइबर से कनेक्टेड है इसलिए कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि 5G की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए देश के 60 से 70% टॉवर्स का फाइबर से कनेक्ट होना अनिवार्य है। नेशनल ब्रॉडबैंड मिशन के अनुसार देश के 70% टावर्स 2024 तक फाइबर से कनेक्ट हो पाएंगे। इन रिपोर्ट्स को देखने के बाद यह सवाल जरूर उठाए जा सकते हैं कि क्या वापस भारत मे 5G को लेकर उसी तरह की देरी होगी जो 3G और 4G के वक़्त हुई थी। इस देरी को दूर करने के लिए 2016 में सरकार ने right-of-way पॉलिसी लेकर आती है। इस पॉलिसी के अनुसार टेलीकॉम टावर सेट किए जाएंगे। फाइबर केबल स्थापित किए जाएंगे और इस क्षेत्र के सभी विवादों को समय रहते सुलझाया जाएगा।

संसदीय स्थायी समिति द्वारा यह भी कहा जा चुका है कि स्पेक्ट्रम की अपर्याप्त उपलब्धता, स्पेक्ट्रम के महंगे दाम और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से भारत 5G के बस को मिस कर जाएगा। इस समिति ने साफ तौर पर अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कंपनियां तो 5G के ट्राइल्ज के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार द्वारा जो अप्रूवल मिलना चाहिए उसमें देरी हो रही है। हालांकि इसी महीने 5G ट्रायल्स को लेकर अप्रूवल दिए जा चुके हैं। भारत में जब तक संपूर्ण रूप से 5G की सेवाएं आएंगी तब तक विश्व की 20% आबादी 5G की सेवाओं का लाभ उठा रही होगी। अब हमें वापस मुड़ कर दूरसंचार मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री श्री रवि शंकर प्रसाद जी के बयान की ओर देखना चाहिए जहां उन्होंने कहा था कि उनके सरकार में पुनः आने के बाद 100 दिनों के अंदर ही 5G नेटवर्किंग के ट्रायल्स शुरू देश मे शुरू कर दिए जाएंगे।